क्या सच में 1 करोड़ वोटर्स के नाम कटे बिहार में ?
बिहार में 1 करोड़ वोटर्स के नाम कटने का दावा सही नहीं है। यह आंकड़ा अतिशयोक्तिपूर्ण और भ्रामक प्रतीत होता है।
- वोटर लिस्ट पुनरीक्षण (SIR): बिहार में 2025 विधानसभा चुनाव से पहले चुनाव आयोग ने विशेष गहन पुनरीक्षण (Special Intensive Revision – SIR) शुरू किया है, जो 24 जून 2024 को आदेशित हुआ। इसका उद्देश्य मतदाता सूची को शुद्ध करना है, जिसमें मृत, दोहरे पंजीकरण वाले, या स्थायी रूप से बाहर गए मतदाताओं के नाम हटाए जा रहे हैं।
- हटाए गए नामों की संख्या:
- 15 जुलाई 2025 तक, 35.5 लाख मतदाताओं के नाम हटाए जाने की प्रक्रिया में हैं, न कि 1 करोड़। इसमें शामिल हैं:
- 12.5 लाख (1.59%) मृत मतदाता।
- 17.5 लाख (2.2%) जो बिहार से स्थायी रूप से बाहर चले गए।
- 5.5 लाख (0.73%) दोहरे पंजीकरण वाले मतदाता
- 15 जुलाई 2025 तक, 35.5 लाख मतदाताओं के नाम हटाए जाने की प्रक्रिया में हैं, न कि 1 करोड़। इसमें शामिल हैं:
बिहार में कुल 7.89 करोड़ मतदाता हैं, और अब तक 6.60 करोड़ (88.18%) ने अपने गणना प्रपत्र (Enumeration Forms) जमा कर दिए हैं
प्रक्रिया की स्थिति: SIR के तहत, 25 जुलाई 2025 तक मतदाताओं को गणना प्रपत्र जमा करने हैं, और 1 अगस्त 2025 को ड्राफ्ट मतदाता सूची प्रकाशित होगी। जिनके प्रपत्र नहीं मिले, उनके नाम ड्राफ्ट सूची में शामिल नहीं होंगे, लेकिन अपील का प्रावधान है।
सुप्रीम कोर्ट ने भी सुझाव दिया है कि आधार, राशन कार्ड, या वोटर आईडी जैसे दस्तावेज सत्यापन के लिए स्वीकार किए जाएं।
1 करोड़ के दावे का स्रोतविपक्ष के आरोप: विपक्षी दल, जैसे RJD और कांग्रेस, ने दावा किया है कि SIR के कारण 1 करोड़ या 2 करोड़ मतदाताओं के नाम कट सकते हैं, खासकर गरीब, दलित, और प्रवासी मजदूरों के। यह दावा मुख्य रूप से संभावित प्रभाव पर आधारित है, न कि वास्तविक आंकड़ों पर।
तेजस्वी यादव ने कहा कि प्रति विधानसभा क्षेत्र में 1% नाम कटने से 7.9 लाख मतदाता प्रभावित हो सकते हैं, जो 2020 के चुनाव में जीत-हार का अंतर था।
कुछ विपक्षी नेताओं ने इसे “वोटबंदी” या “NRC का बैकडोर” करार दिया, यह दावा करते हुए कि यह प्रक्रिया अल्पसंख्यकों और गरीबों को निशाना बना सकती है।
सोशल मीडिया और अफवाहें: X पर कुछ पोस्ट्स में 1 करोड़ या अधिक नाम कटने की बात कही गई, लेकिन ये बिना ठोस सबूत के हैं। उदाहरण के लिए, योगेंद्र यादव और अन्य ने इसे लोकतंत्र के लिए खतरा बताया, लेकिन कोई आधिकारिक आंकड़ा इसकी पुष्टि नहीं करता।
वास्तविकता की जांचचुनाव आयोग का पक्ष: आयोग का कहना है कि SIR का उद्देश्य मतदाता सूची की सटीकता सुनिश्चित करना है।
4.96 करोड़ मतदाताओं, जिनके नाम 2003 की सूची में हैं, को अतिरिक्त दस्तावेज देने की जरूरत नहीं है। बाकी 2.93 करोड़ को अपनी पात्रता साबित करनी होगी, लेकिन आधार, राशन कार्ड, या 2003 की सूची में माता-पिता के नाम जैसे विकल्प उपलब्ध हैं।
प्रवासी मतदाताओं के लिए ऑनलाइन प्रपत्र जमा करने की सुविधा है (https://voters.eci.gov.in या ECINet ऐप के जरिए)।
दस्तावेजों की कमी: बिहार में दस्तावेजों की कमी (जैसे जन्म प्रमाणपत्र, जो केवल 2.8% लोगों के पास है) एक चुनौती है, लेकिन आयोग ने सत्यापन प्रक्रिया को लचीला बनाया है।
अवैध प्रवासियों का मुद्दा: SIR के दौरान नेपाल, बांग्लादेश, और म्यांमार के कुछ लोगों के नाम पाए गए, जिन्हें अंतिम सूची में शामिल नहीं किया जाएगा। यह भी विवाद का कारण बना है।
निष्कर्ष1 करोड़ नाम कटने का दावा गलत है। अभी तक केवल 35.5 लाख नाम हटाए जाने की प्रक्रिया में हैं, और यह संख्या अंतिम नहीं है क्योंकि सत्यापन और अपील की प्रक्रिया बाकी है।
विपक्ष के दावे और सोशल मीडिया पर 1 करोड़ या 2 करोड़ के आंकड़े अतिशयोक्ति या संभावित प्रभाव पर आधारित हैं, न कि वास्तविक डेटा पर।
यदि आपका नाम मतदाता सूची से हटने का खतरा है, तो 25 जुलाई 2025 तक गणना प्रपत्र जमा करें। आप ऑनलाइन पोर्टल या BLO के जरिए ऐसा कर सकते हैं। सुप्रीम कोर्ट इस मामले की सुनवाई भी कर रहा है, और अगली सुनवाई 28 जुलाई 2025 को है।