*आध्यात्मिक यात्रा*महाशिवरात्रि का पर्व भारतीय संस्कृति और आध्यात्मिकता के केंद्र में एक अत्यंत विशिष्ट स्थान रखता है। हर वर्ष फाल्गुन मास की कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को हम इस महापर्व को श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाते हैं। शिवालयों में भक्तों का तांता लगा रहता है, ‘ॐ नमः शिवाय’ के मंत्रोच्चार से दिशाएं गुंजायमान होती हैं और पूरी रात जागरण का विधान किया जाता है। किंतु, इन बाह्य कर्मकांडों, अनुष्ठानों और परंपराओं के घेरे से निकलकर यदि हम गहराई से विचार करें, तो एक मौलिक प्रश्न खड़ा होता है—वास्तव में महाशिवरात्रि क्या है और हम इसे क्यों मनाते हैं? क्या यह केवल एक पौराणिक कथा का उत्सव है, या यह हमारे स्वयं के अस्तित्व के रूपांतरण का एक स्वर्णिम अवसर है?भगवान शिव का स्वरूप विरोधाभासों का एक अद्भुत और गहरा समन्वय है। वे कोई सामान्य देवता नहीं, बल्कि एक ‘तत्व’ हैं—एक शाश्वत ऊर्जा। उनके व्यक्तित्व में एक ओर परम वैराग्य है, तो दूसरी ओर वे आदर्श गृहस्थ भी हैं। उनके मस्तक पर सुशोभित चंद्रमा परम शीतलता और शांति का प्रतीक है, जबकि उनके कंठ में स्थित ‘कालकूट विष’ संसार की समस्त कड़वाहट और नकारात्मकता को स्वयं में समाहित करने की क्षमता को दर्शाता है। उनके हाथ में त्रिशूल है, जो केवल शस्त्र नहीं, बल्कि सत, रज और तम—इन तीनों गुणों पर विजय का प्रतीक है। उनके गले में लिपटा सर्प मृत्यु और भय पर विजय की उद्घोषणा करता है। ये प्रतीक केवल पुराणों के अलंकार नहीं हैं, बल्कि ये जीवन जीने के सूत्र हैं। शिव हमें सिखाते हैं कि संसार में रहते हुए भी कैसे असंपृक्त रहा जा सकता है और कैसे अपने भीतर की विषमता को समता में बदला जा सकता है।महाशिवरात्रि की रात्रि को ‘अंधकार की रात’ कहा जाता है। यह अंधकार केवल सूर्य के अभाव का नहीं, बल्कि हमारे अंतर्मन में व्याप्त अज्ञान, अहंकार, ईर्ष्या, क्रोध, लोभ और असुरक्षा का प्रतीक है।अक्सर हम मंदिर में जाकर भगवान के सामने नतमस्तक होते हैं, जो सरल है, लेकिन अपने स्वयं के दोषों के सामने झुकना और उन्हें स्वीकार करना अत्यंत कठिन है। वास्तविक ‘जागरण’ वह नहीं है जो केवल आंखों को खुला रखकर किया जाए, बल्कि वह है जो हमारी चेतना को झकझोर दे। क्या हम रात भर जागते हुए अपनी सजगता (Awareness) को बढ़ा रहे हैं? उपवास का अर्थ केवल अन्न का त्याग नहीं है, बल्कि ‘उप-वास’ का अर्थ है ‘निकट निवास करना’—अर्थात अपनी आत्मा और परमात्मा के निकट बैठना। जब तक हम अपने नकारात्मक विचारों और दूषित आदतों का उपवास नहीं करते, तब तक केवल शरीर को भूखा रखने का कोई आध्यात्मिक लाभ नहीं मिलता।समुद्र मंथन की कथा इस संदर्भ में अत्यंत प्रासंगिक है। जब देवों और असुरों के बीच मंथन हुआ, तो सबसे पहले हलाहल विष निकला। इसे पीने का साहस केवल महादेव में था। हमारे जीवन में भी जब हम आत्म-मंथन करते हैं, तो सबसे पहले हमारी अपनी बुराइयां और कड़वाहट बाहर आती हैं। समाज, परिवार और रिश्तों के बीच आने वाले ‘वैचारिक विष’ को जो व्यक्ति धैर्य और विवेक के साथ पचा लेता है, वही ‘नीलकंठ’ होने का गौरव प्राप्त करता है। यह क्षमता विकसित करना ही सच्ची शिव-भक्ति है। शिव का तांडव केवल एक विनाशकारी नृत्य नहीं है, बल्कि वह सृष्टि के निरंतर परिवर्तन की लय है। वह हमें संदेश देता है कि जो पुराना है, जो जड़ हो चुका है, उसका अंत आवश्यक है ताकि नए और सुंदर का सृजन हो सके। जीवन में परिवर्तन अपरिहार्य है, और उसे स्वीकार करना ही विकास की पहली सीढ़ी है।इस वर्ष की महाशिवरात्रि हमें एक अनूठा अवसर प्रदान करती है। हम शिव को जल, दूध और बेलपत्र तो अर्पित करते ही हैं, लेकिन क्या इस बार हम अपने भीतर की किसी एक बुराई या गलत आदत का ‘त्याग-पत्र’ उन्हें सौंप सकते हैं? शिव मंदिर के गर्भगृह में जितने प्रतिष्ठित हैं, उतने ही वे हमारी सजगता और श्वास में भी व्याप्त हैं। शिव वह शून्य हैं जिससे सब कुछ उत्पन्न होता है और वह अनंत भी हैं जिसमें सब कुछ विलीन हो जाता है।अतः, इस महाशिवरात्रि पर आइए हम केवल बाहर के मंदिरों में ही न भटकें, बल्कि अपने अंतर्मन के मंदिर में प्रवेश करें। अपने भीतर के उस अंधकार को पहचानें जो हमें बढ़ने से रोक रहा है, और उस पर शिव-तत्व के विवेक का प्रकाश डालें। जब हम अपने अहंकार को विसर्जित कर पूर्ण समर्पण के साथ स्वयं को देखते हैं, तभी वास्तविक ‘शिवोहम’ (मैं ही शिव हूँ) का अनुभव संभव होता है। इस शिवरात्रि का संकल्प केवल उत्सव तक सीमित न रहे, बल्कि यह हमारे चरित्र के परिमार्जन और चेतना के उत्थान का प्रारंभ बने।
Sanyukta Deshmukh Delhi Adhyaksha Sudarshana Foundation