संवाद फाल्गुन पूर्णिमा की रात जलती हुई अग्नि केवल लकड़ियों का ढेर नहीं होती; वह भारतीय स्मृति का एक जीवंत प्रतीक होती है। सदियों से हम होलिका दहन को अधर्म पर धर्म की विजय के रूप में मनाते आए हैं। कथा हमें बताती है कि हिरण्यकशिपु के अत्याचारों के बीच प्रह्लाद की भक्ति बच गई और होलिका जल गई। परंतु हर युग अपनी दृष्टि से मिथकों को पढ़ता है। इसीलिए आज एक नया प्रश्न उठ रहा है — क्या होलिका केवल अधर्म की प्रतीक थी, या वह सत्ता और पितृसत्ता की संरचना में फँसी एक स्त्री भी थी, जिसकी कथा को हमने एक ही आयाम में सीमित कर दिया?होलिका की मूल कथा का स्रोत भागवत पुराण है। स्कंध 7 में वर्णित प्रसंग के अनुसार हिरण्यकशिपु, जो स्वयं को ईश्वर से श्रेष्ठ मानता था, अपने पुत्र प्रह्लाद की विष्णु-भक्ति से क्रोधित होकर उसे मारने का षड्यंत्र रचता है। उसकी बहन होलिका, जिसे अग्नि से न जलने का वरदान प्राप्त था, प्रह्लाद को गोद में लेकर अग्नि में बैठती है। किंतु वरदान निष्फल हो जाता है — होलिका भस्म हो जाती है और प्रह्लाद बच जाता है। यही प्रसंग विष्णु पुराण में भी मिलता है। पारंपरिक व्याख्या स्पष्ट है: यह अहंकार और अत्याचार के अंत का उत्सव है।किन्तु आधुनिक वैचारिक परिप्रेक्ष्य में, विशेषतः मराठी प्रगतिशील चिंतक आहा साळुंखे के लेखन में, पौराणिक कथाओं को केवल धार्मिक आख्यान नहीं माना गया है। अपनी पुस्तकों — जैसे “हिंदू संस्कृती आणि स्त्री” तथा पौराणिक पुनर्पाठ पर आधारित अन्य लेखन — में साळुंखे ने यह तर्क रखा कि मिथक समाज की सत्ता-संरचना और पितृसत्तात्मक व्यवस्था को भी प्रतिबिंबित करते हैं। उनका कहना है कि इतिहास और मिथक विजेताओं की दृष्टि से लिखे जाते हैं; जो सत्ता के पक्ष में होता है, वह देवत्व प्राप्त करता है, और जो उसके विरुद्ध खड़ा होता है, वह दानवीकरण का शिकार हो सकता है।साळुंखे के इस विश्लेषण की रोशनी में जब हम होलिका को देखते हैं, तो कथा एक नया आयाम ग्रहण करती है। होलिका स्वयं निर्णय लेने वाली शासक नहीं थी; वह एक भाई की आज्ञा का पालन करने वाली स्त्री थी। हिरण्यकशिपु की निरंकुश सत्ता के सामने उसकी भूमिका क्या थी? क्या वह स्वतंत्र रूप से निर्णय ले सकती थी? या वह भी उसी सत्ता-तंत्र की एक कड़ी थी, जिसने अंततः उसे ही भस्म कर दिया? साळुंखे यह संकेत देते हैं कि पौराणिक कथाओं में स्त्रियों को अक्सर या तो देवी बनाया गया या दानवी, किंतु उनके मानवीय और सामाजिक संदर्भों को अनदेखा कर दिया गया।कुछ प्रगतिशील व्याख्याएँ यह भी कहती हैं कि होलिका को केवल खलनायिका के रूप में प्रस्तुत करना एक सरलीकरण है। यदि वह भाई के आदेश का विरोध करती, तो क्या उसका अस्तित्व सुरक्षित रहता? पितृसत्तात्मक और राजकीय सत्ता के दबाव में उसका विकल्प कितना स्वतंत्र था? इस दृष्टिकोण से होलिका एक ऐसी स्त्री बनकर उभरती है, जो अन्यायपूर्ण सत्ता-संघर्ष के बीच बलि का पात्र बनती है। यह व्याख्या शास्त्रीय ग्रंथों के शब्दशः पाठ से भिन्न है, किंतु समाजशास्त्रीय पुनर्पाठ की प्रक्रिया का हिस्सा है।यहाँ यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि उपलब्ध पुराणिक स्रोतों में होलिका को अधर्म का साथ देने वाली ही बताया गया है। इसलिए यह दावा कि वह शास्त्रीय अर्थों में “अन्याय के विरुद्ध लड़ रही थी” प्रत्यक्ष रूप से ग्रंथों में नहीं मिलता। परंतु साळुंखे जैसे चिंतकों का आग्रह यह है कि मिथकों को स्थिर सत्य न मानकर गतिशील सामाजिक दस्तावेज़ के रूप में पढ़ा जाए। यदि प्रह्लाद प्रतिरोध का प्रतीक है, तो होलिका सत्ता के आदेश की शिकार स्त्री भी हो सकती है — एक ऐसी स्त्री, जिसका अंत हमें यह सिखाता है कि अन्यायपूर्ण सत्ता के साथ खड़े होने का परिणाम अंततः विनाश ही होता है।कम्युनिस्ट चिंतन की ओर देखें तो Karl Marx ने धर्म और मिथकों को सामाजिक-आर्थिक संरचना से जोड़ा। उनकी दृष्टि में धार्मिक आख्यान अक्सर शासक वर्ग की वैचारिक शक्ति को सुदृढ़ करते हैं। यदि इस दृष्टिकोण से होलिका की कथा को पढ़ें, तो हिरण्यकशिपु निरंकुश सत्ता का प्रतीक है, प्रह्लाद वैचारिक प्रतिरोध का, और होलिका उस सत्ता-संरचना की एक कड़ी। भारतीय संदर्भ में Communist Party of India (Marxist) जैसे संगठनों ने भी सामाजिक न्याय और समानता के विमर्श में धार्मिक आख्यानों की आलोचनात्मक समीक्षा की है। किंतु भारतीय समाज की जटिलता केवल वर्ग-संघर्ष तक सीमित नहीं; यहाँ आस्था और सांस्कृतिक निरंतरता भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।होलिका दहन का अनुष्ठान इस संदर्भ में प्रतीकात्मक हो उठता है। इसमें किसी व्यक्ति का नहीं, बल्कि एक प्रवृत्ति का दहन होता है। यदि हम साळुंखे के पुनर्पाठ को ध्यान में रखें, तो यह अग्नि केवल अधर्म का अंत नहीं, बल्कि उस सत्ता-तंत्र की आलोचना भी हो सकती है, जो स्त्रियों और कमजोरों को बलि का पात्र बनाता है। इस अर्थ में होलिका की कथा हमें चेतावनी देती है कि अन्यायपूर्ण सत्ता अंततः स्वयं को भी नष्ट करती है।आज सोशल मीडिया और समकालीन विमर्श में होलिका को नई दृष्टि से देखा जा रहा है। कोई उसे पितृसत्ता की शिकार मानता है, कोई उसे अधर्म का प्रतीक, तो कोई उसे सत्ता-संघर्ष की त्रासदी। यह विविधता इस बात का प्रमाण है कि मिथक जीवित हैं। वे समय के साथ बदलते हैं, प्रश्नों को जन्म देते हैं और समाज को आत्ममंथन के लिए प्रेरित करते हैं।इस होली, जब हम अग्नि के चारों ओर परिक्रमा करें, तो यह भी सोचें कि क्या हम केवल एक दानवी चरित्र का दहन कर रहे हैं, या अपने भीतर के अन्याय और अहंकार को भी जला रहे हैं। यदि होलिका को अन्यायपूर्ण सत्ता की शिकार स्त्री के रूप में देखें, तो उसका दहन हमें यह स्मरण कराता है कि अन्याय के साथ खड़ा होना अंततः विनाश का मार्ग है। यदि उसे अधर्म का प्रतीक मानें, तो भी उसका दहन हमें नैतिक साहस का संदेश देता है।अंततः होली का सार संवाद में है। मिथकों को न अंध-आस्था से स्वीकार करना चाहिए, न अंध-विरोध से नकारना। आहा साळुंखे के पुनर्पाठ हमें यही सिखाते हैं कि प्रश्न पूछना परंपरा का अपमान नहीं, बल्कि उसे जीवित रखने का माध्यम है। होलिका की कथा, चाहे जिस दृष्टि से पढ़ी जाए, हमें यह अवसर देती है कि हम अन्याय, पितृसत्ता और सत्ता-संघर्ष पर गंभीरता से विचार करें।इस होली, यदि कुछ जलाना है, तो केवल लकड़ी नहीं — बल्कि वह मानसिकता जो किसी भी स्त्री या व्यक्ति को सत्ता के खेल में बलि का पात्र बना देती है। तभी होलिका दहन की अग्नि वास्तव में प्रकाश बन सकेगी।