साल था 2002 और मैदान था लॉर्ड्स, नेट वेस्ट ट्रॉफी के फाइनल में सौरव गांगुली का अपनी शर्ट उतरकर जश्न मनाना किसे याद नहीं। दरअसल दादा का जश्न मनाने का ये तरीका उसी टूर्नामेंट के एक मैच में इंग्लैंड के दिग्गज ऑलराउंडर एंड्रयू फ्लिंटॉफ के ज़रिए भारत की हार पर जश्न के दौरान उतारे गए शर्ट का जवाब था।
जब मैने होश संभाला और क्रिकेट को अच्छे से देखना शुरू किया तो उस वक्त भारतीय टीम के कप्तान थे सौरव गांगुली। वही गांगुली जिनके शिक्षा देखने के बाद अलग हो आनंद आता था। मुझे गांगुली का फ्रंटफुट में आकर थोड़ा झुककर सामने की तरफ़ खेला जाने वाला शॉट बहुत ज़्यादा पसंद था। ये शॉट गांगुली अक्सर स्पिनर्स के अगेंस्ट खेला करते थे।
उस दौर में क्रिकेट सम्राट पत्रिका में गांगुली की बहुत सी तस्वीरें उस पोज़ में आया करती थीं। भारत के मैच के बाद हर दैनिक अखबार में खिलाड़ियों की जो तस्वीरें आया करती थीं, वो हमारे लिए किसी दूसरी दुनिया की तस्वीर होती थी। उन्हें देखकर जो खुशी होती थी, वो बयां नहीं किया जा सकता।
आज आठ जुलाई है । आज ही के दिन कोलकाता में भारतीय क्रिकेट में जुझारूपन लाने वाले एग्रेसिव क्रिकेट कप्तान और पूरे क्रिकेट जगत के दादा सौरव गाँगुली का जन्म हुआ था ।
सौरव गाँगुली ने भारत के कप्तान बनने का सफर आसानी से तय नहीं किया बल्कि कई आज़माईश उनकी जिंदगी में आईं। उनके लम्बे संघर्ष की कहानी कम ही लोग जानते हैं । भारत में अक्सर बच्चों को बचपन से ही क्रिकेट का शौक होता है। सौरव गांगुली को भी बचपन से ही क्रिकेट का शौक था और उन्होंने अपने बड़े भाई स्नेहाशीष गांगुली से ये शौक़ विरासत में पाया था, जोकि एक प्रथम श्रेणी क्रिकेटर थे।
पहली बार फर्स्ट क्लास क्रिकेट में सौरव गाँगुली के क़दम दिल्ली के खिलाफ पड़े थे। यह मैच रणजी ट्राफी का फाईनल था, इसमें दिल्ली के खिलाफ़ गाँगुली ने कोई बहुत बड़ा स्कोर नहीं किया था । मध्य क्रम में खेलते हुए मात्र 22 रन बनाए थे । मगर ये 22 रन उनकी कलात्मक बल्लेबाजी का बेहतरीन नमूना थे ।

दादा सबसे पहले 1992 में भारतीय टीम के लिए चुने गए थे । पर उन्होंने अपने खेल का सबसे बेहतरीन नमूना 1996 में इंग्लैंड के खिलाफ पेश किया था, जब गांगुली ने विपरीत परिस्थितियों में लार्ड्स के मैदान में यादगार 131 रन की पारी खेली थी।
जब जब हम उस दौर के क्रिकेट में नज़र डालते हैं। तो हमें गाँगुली और सचिन तेंदुलकर की वो ओपनिंग जोड़ी नज़र आती है। जिसे देखने के लिए पूरा भारत किसी भी मैच के दौरान दूरदर्शन के सामने टकटकी लगाए बैठा रहता था।
दोनों एक साथ लम्बे समय तक पारी की ओपनिंग करते रहे ,और भारत ही नहीं बल्कि दुनिया की एक सफल ओपनिंग जोड़ी के रूप में प्रसिद्ध हुए । यहां पर मैं आपको ये बताते चलूं कि दादा ने अपनी ओपनिंग वाली जगह सहवाग के लिए खाली की थी। उस वक्त तक सहवाग छठवें नंबर पर बल्लेबाजी करने आते थे। वो सौरव गांगुली जी थे, जिन्होंने सहवाग को ओपन भेजना शुरू किया था। इस बात का खुलासा खुद सहवाग आकर चुके हैं।
आईए दादा के रिकॉर्ड्स के बारे में जानते हैं।
गाँगुली नें प्रथम श्रेणी क्रिकेट में 15687 रन बनाए ।
टेस्ट क्रिकेट में 16 शतक के साथ 7217 रन बनाए ।
वन डे में 22 शतक और 72 अर्धशतक के साथ गाँगुली ने लगभग ,1 300 रन बनाने में सफलता की ।
ये भी याद रखा जाना चाहिए कि गांगुली पार्ट टाइम बालर रहे हैं और 100 से अधिक बेट्समेन को गाँगुली ने अपना शिकार बनाया है ।
गाँगुली जितने शानदार बल्लेबाज थे , उससे भी अच्छे कप्तान थे । खिलाड़ियों के अँदर आत्मविश्वास और दबंगता उन्होंने ही भरी है। जिसके नज़ारे हम लोग आज भी देखते रहते हैं।
शोएब ग़ाज़ी