सोनिया गांधी असल मे उस कद की नेता है जो 1998 के कांग्रेस के बुरे दौर में उसका अध्य्क्ष पद का भार सम्भाला था, जब कांग्रेस भाजपा के सामने कही नही टिकती थी,अटल बिहारी वाजपेयी देश के सर्वप्रिय नेता थे और उनका सानी कोई नही था ।
लेकिन सोनिया ने इस चुनोती को स्वीकार किया और अध्यक्ष पद का भार सम्भाला था । इसके बाद सोनिया गांधी की अध्यक्षता और उन्ही की ही रणनीति के बदौलत कांग्रेस आगे बढ़ी और अटल बिहारी वाजपेयी के “इंडिया शाइनिंग” नारे को अपनी रणनीति के दम पर हराने का दम खम दिखाया ।
सीनियर जर्नलिस्ट और “सोनिया” के राइटर रशीद किदवई सर अपनी इस किताब में सोनिया की शुरुआत दौर से लेकर 2009 तक कि बदलती हुई राजनीति पर बड़ी शानदार तरह से लिखते हैं। जहां वो छोटे से छोटा पार्टी इंटरनल संघर्ष और बड़ी घटना के पीछे की इनसाइड स्टोरी लिख देते हैं।
“सोनिया” हमें उस समय की याद दिलाती है जब सोनिया गांधी के प्रधानमंत्री पद पर नाम आने पर बवाल मचा दिया गया सवाल यहाँ उनके “भारतीय” न होने पर आ गया,लेकिन यहां भी सोनिया ही आगे आयी और दिखाया कि “नेता” क्या होता है,और त्याग देते हुए प्रधानमंत्री पद की शपथ लेने से इनकार कर दिया । ये अपने आप मे एक बडी और ज़िम्मेदारी से भरी बात थी क्योंकि यहां से सवाल देश का आ गया था। उसकी संस्कृति में बसे त्याग का आ गया था ।

कांग्रेस को दो बार लगातर सत्ता पर लेकर आने वाली सोनिया गांधी शायद अकेली ही ऐसी नेता होंगी जो अटल बिहारी जैसे दिग्गज नेता की राजनीति पर विराम लगा दिया और अपनी पार्टी को सत्ता पर पहुंचाया । इस बात को याद रखा जाना जरूरी है क्योंकि यहां से हमे राजनीति की वो सीख मिलती है जो हमे “सत्ता” से ऊपर भी बहुत कुछ सिखाती है। जिसमे त्याग है,कर्तव्य है और रणनीतियों के साथ परिवार की जिम्मेदारियां भी है।
ये किताब 80 के दौर से लेकर नई सदी की राजनीति की बारीकियों के साथ साथ एक महिला की कहानी सुनाती है,जो विधवा हो चुकी हैं,जिनके दो बच्चे हैं और अपने परिवार के अलावा लाखों की तादाद में पार्टी के कार्यकर्ताओं ने उन्हें अपना नेता माना है और उनके ऊपर “विदेशी” से लेकर अच्छी हिंदी न बोलने वाले सारे आरोपों के साथ साथ देश की ज़िम्मेदारी आती है।
आपके सामने फ़िल्म की तरह ये किताब चलती है ढलती है और आपको वहां तक पहुंचाती है जहाँ से 30 सालों की राजनीति की कहानियां देखने को मिलती है। ज़रूर पढिये।