हिमालय की बर्फ से ढकी ऊँचाइयों में इन दिनों एक अजीब सी बेचैनी है। वहाँ की ठंडी हवा में भी अब ताप महसूस होता है, क्योंकि लडाख में एक ऐसी लड़ाई शुरू हो चुकी है जो सिर्फ़ पहाड़ों तक सीमित नहीं है — यह लड़ाई है संविधान, लोकतंत्र और आत्मसम्मान की। इस संघर्ष के केंद्र में हैं सोनम वांगचुक — वह शख्स जिसने लडाख की शिक्षा, पर्यावरण और आत्मनिर्भरता को नया रास्ता दिखाया। वही वांगचुक जो कभी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की नीतियों की प्रशंसा करते थे, आज उसी सरकार की जेल में हैं, वह भी राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम (NSA) के तहत।
लडाख का यह संघर्ष अचानक शुरू नहीं हुआ। इसकी जड़ें 1980 के दशक में हैं, जब वांगचुक के पिता सोनम वांग्याल ने अपने क्षेत्र को अनुसूचित जनजाति का दर्जा दिलाने के लिए अनशन किया था। चार दशक बाद वही संघर्ष बेटे ने आगे बढ़ाया, लेकिन इस बार दांव और बड़ा है — लडाख की पहचान, जमीन और अधिकारों की रक्षा का। 2019 में जब केंद्र सरकार ने जम्मू-कश्मीर से लडाख को अलग कर केंद्र शासित प्रदेश बनाया, तब लोगों ने सोचा कि अब विकास की नई सुबह आएगी। लेकिन पाँच साल बाद हालात उलटे हैं। जनता कह रही है — हमने राज्य का दर्जा खोकर सिर्फ़ सरकारी आदेशों का इंतजार करने का हक़ पा लिया है।
लडाख के लोग दो प्रमुख मांगें कर रहे हैं — राज्य पद (Statehood) और संविधान के छठे परिशिष्ट (Sixth Schedule) में शामिल किए जाने की। छठे परिशिष्ट के तहत स्थानीय जनजातियों को अपनी जमीन, जंगल और परंपराओं पर संवैधानिक सुरक्षा मिलती है। लेकिन केंद्र सरकार इससे बचती रही है। लडाख के लोगों का कहना है कि उनकी जमीनें अब बाहरी निवेशकों के हवाले की जा रही हैं, जबकि उन्हें अपने ही संसाधनों पर निर्णय का अधिकार नहीं है। वांगचुक ने शांतिपूर्ण आंदोलन शुरू किया, संवाद और संविधान की भाषा में सवाल उठाए — क्या लडाख के लोगों को अपने भविष्य पर बोलने का अधिकार नहीं है? लेकिन जब सवाल असहज हो जाते हैं, तो सत्ता जवाब देने के बजाय उन्हें दबा देती है। 26 सितंबर 2025 को सोनम वांगचुक को NSA के तहत गिरफ्तार कर लिया गया। आरोप यह कि वे “देश की सुरक्षा के लिए खतरा” हैं।
लडाख में विरोध भड़क उठा, चार लोगों की जानें चली गईं। लेकिन प्रदर्शनकारियों ने स्पष्ट किया कि यह हिंसा उनकी राह नहीं है — वे सिर्फ़ अधिकार मांग रहे हैं, अलगाव नहीं। सरकार ने न सिर्फ़ वांगचुक को जेल में डाला बल्कि उनके संस्थान SECMOL का विदेशी चंदा (FCRA) लाइसेंस भी रद्द कर दिया। वांगचुक की पत्नी ने आरोपों को झूठा बताया और कहा कि उनके पति का पाकिस्तान या किसी विदेशी संगठन से कोई संबंध नहीं है — वे सिर्फ़ अपने देश और अपनी धरती से प्रेम करते हैं। जेल से वांगचुक ने संदेश भेजा — “मैं तब तक जेल में रहूंगा जब तक न्याय नहीं मिलता, लेकिन मेरे लोग शांतिपूर्ण रहें। हम भारत को नहीं तोड़ना चाहते, हम उसे बेहतर बनाना चाहते हैं।”
अब यह मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुँच चुका है। अदालत ने केंद्र और लडाख प्रशासन से पूछा है — क्या अपने हक़ की मांग करना वास्तव में देश की सुरक्षा के लिए खतरा है? क्या लोकतंत्र में असहमति अपराध बन चुकी है? यह प्रश्न सिर्फ़ वांगचुक का नहीं, बल्कि हर उस नागरिक का है जो संविधान में लिखे अधिकारों पर भरोसा करता है। अनुच्छेद 240 के तहत केंद्र सरकार को यह शक्ति है कि वह केंद्र शासित प्रदेशों के लिए नियम बनाए, यानी लडाख का भविष्य दिल्ली के आदेशों से तय होता है, न कि लडाख के वोट से। वांगचुक और उनके समर्थक यही कह रहे हैं कि उन्हें अपने भविष्य पर निर्णय लेने का हक़ मिलना चाहिए।
अगर लडाख को छठे परिशिष्ट में शामिल किया गया, तो वहाँ की स्थानीय परिषदों को भूमि, वन और पारंपरिक संसाधनों पर नियंत्रण मिलेगा। लेकिन शायद यही बात सत्ता को असुविधाजनक लगती है — एक ऐसा क्षेत्र जो आत्मनिर्भर हो और केंद्र पर पूरी तरह निर्भर न रहे। यही वजह है कि इस आंदोलन को दबाने की कोशिश की जा रही है। पर सवाल यह है कि क्या यह दबाव टिकेगा?
सोनम वांगचुक अब सिर्फ़ एक पर्यावरण कार्यकर्ता नहीं रहे — वे एक प्रतीक बन चुके हैं, एक ऐसी आवाज़ जो कहती है कि “भारत की एकता उसकी विविधता में है, न कि एकरूपता में।” उनकी गिरफ्तारी यह दिखाती है कि जब कोई नागरिक संविधान की भाषा में सत्ता से सवाल करता है, तो सत्ता उसकी आवाज़ को राष्ट्रविरोधी करार देने लगती है। लेकिन इतिहास साक्षी है — सच्ची देशभक्ति सत्ता की चापलूसी में नहीं, बल्कि जनता के अधिकारों की रक्षा में होती है।
आज लडाख में जो हो रहा है, वह आने वाले भारत की दिशा तय करेगा। क्या हमारा लोकतंत्र इतना मजबूत है कि वह असहमति को सुन सके? या फिर हम उस दौर में लौट रहे हैं जहाँ हर आलोचना “खतरा” मानी जाती है? जब सत्ता संविधान से ऊपर खुद को मानने लगती है, तब लोकतंत्र धीरे-धीरे मरता नहीं — वह सांस-सांस टूटता है।
अब जिम्मेदारी न्यायपालिका, मीडिया और जनता — तीनों की है। न्यायपालिका को तय करना होगा कि क्या संविधान अब भी सर्वोच्च है; मीडिया को तय करना होगा कि वह सत्ता का मुखपत्र बनेगा या जनता की आवाज़; और जनता को तय करना होगा कि वह चुप रहेगी या बोलेगी। क्योंकि आज जो लडाख में हो रहा है, वह कल देश के किसी और हिस्से में हो सकता है।
लडाख की बर्फ अब पिघल रही है — पर यह केवल जलवायु परिवर्तन नहीं, यह राजनीतिक तापमान का संकेत है। अगर सरकार ने संवाद और न्याय का रास्ता नहीं चुना, तो यह असंतोष सीमांत से उठकर पूरे देश में फैल सकता है। सत्ता अस्थायी होती है, पर संविधान और जनता की चेतना अमर होती है। सोनम वांगचुक की गिरफ्तारी इतिहास में एक चेतावनी के रूप में दर्ज होगी — कि जब सत्ता ने दमन किया, तब किसी ने खामोशी तोड़ी।
वांगचुक भले जेल में हैं, लेकिन उनकी आवाज़ अब सीमाओं में कैद नहीं रह सकती। उन्होंने कहा था — “हम भारत को नहीं तोड़ेंगे, हम भारत को बेहतर बनाएंगे।” यही वो वाक्य है जो आज लडाख की बर्फीली हवाओं में गूंज रहा है। यह सिर्फ़ एक क्षेत्र की लड़ाई नहीं, बल्कि भारत की आत्मा की पुकार है।
Sanyukta Deshmukh
Founder president of Sudarshana foundation