जावेद अख्तर, मुसलमान नहीं है, वो “मुस्लिम” नाम वाले नास्तिक हैं। जो मुसलमानों को कट्टर और रूढ़िवादी समझने वाले को खुश करने के लिए अक्सर बोलते हैं।
क्योंकि जो तीखापन, मसालेदार और चटपटा मीडिया की जहरीली डिबेट में थोड़ा सा कम रहा जाता है। जावेद अख़्तर साहब “लिबरल” ज़ुबान में उर्दू और हिंदी की चाशनी के साथ मीडिया और खासकर सोशल मीडिया को दे देते हैं।
अगर आपको शक है तो बताइए, यह सवाल कितने जरूरी है कि लल्लनटॉप जैसे चैनल पर विख्यात पढ़े लिखे सौरभ द्विवेदी जी उनसे पूछते हैं।
हालांकि भारत में गरीबी रेखा से नीचे करोड़ों लोगों को इस सवाल से कोई फर्क नहीं पड़ेगा, लेकिन सौरभ द्विवेदी जी और जावेद अख्तर जी को जरूर फर्क पड़ता है।
क्योंकि जब मुसलमान, धर्म और कट्टरता से लेकर पाकिस्तान एक ही जगह जुड़ कर जाता है तो ऑडियंस को बहुत मज़ा आता है।
और वो भी तब जब देश के लाखों लोग यह नहीं जाने कि जावेद अख्तर “मुसलमान” नहीं है।