संस्कारों का हिमालय और आधुनिक स्वराज्य का संकल्प
राजमाता जिजाऊ जयंती विशेष
राजमाता जिजाऊ मासाहेब केवल छत्रपति शिवाजी महाराज की माता नहीं थीं, वे एक विचारधारा थीं। वे केवल युद्धवीर को जन्म देने वाली जननी नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय, राजनीतिक चेतना और मानवीय मूल्यों से युक्त स्वराज्य की पहली शिल्पकार थीं। इतिहास की अनेक पुस्तकों—चाहे वह सबसासद बखर हो, सभासद बखर, शिवभारत हो या आधुनिक इतिहासकारों के ग्रंथ—सभी में जिजाऊ का उल्लेख एक राजनीतिक शिक्षिका के रूप में मिलता है, न कि केवल एक त्यागमयी माता के रूप में।
आज जिजाऊ जयंती पर यदि हम केवल भावुक श्रद्धांजलि तक सीमित रह गए, तो यह जिजाऊ के साथ अन्याय होगा। क्योंकि जिजाऊ ने कभी भावुकता नहीं, बल्कि विवेक और विद्रोह सिखाया था।
जिजाऊ और राजनीतिक संस्कार : ‘शिवबा’ को गढ़ने की प्रयोगशाला
इतिहास स्पष्ट कहता है कि जिजाऊ ने शिवाजी महाराज को केवल तलवार चलाना नहीं सिखाया, बल्कि सत्ता को पहचानना, शोषण को समझना और अन्याय के विरुद्ध खड़े होना सिखाया। वे रामायण-महाभारत की कहानियाँ केवल धर्मग्रंथ की तरह नहीं सुनाती थीं, बल्कि उन्हें राजनीतिक पाठ की तरह प्रस्तुत करती थीं—जहाँ राम मर्यादा पुरुषोत्तम हैं तो शंबूक वध पर प्रश्न भी खड़े होते हैं, जहाँ कृष्ण नीति सिखाते हैं तो सत्ता की चालें भी उजागर होती हैं।
जिजाऊ का ‘संस्कार’ मतलब केवल नैतिक उपदेश नहीं था, बल्कि राजनीतिक चेतना था। यही कारण है कि कम उम्र में शिवाजी महाराज को यह समझ आ गया था कि—
“राजा जन्म से नहीं, कर्तव्य से बनता है।”
मनुस्मृति बनाम स्वराज्य : जिजाऊ का वैचारिक विद्रोह
इतिहास का एक असुविधाजनक सत्य यह है कि शिवाजी महाराज के राज्याभिषेक का सबसे बड़ा विरोध मनुस्मृति समर्थक ब्राह्मणवादी व्यवस्था ने किया था। उन्हें ‘शूद्र’ कहकर राजा मानने से इंकार किया गया। यह केवल शिवाजी महाराज का अपमान नहीं था, बल्कि स्वराज्य की आत्मा पर हमला था।
यदि आज हम पूछें—उस समय जिजाऊ कहाँ थीं?
तो उत्तर स्पष्ट है—वह मौन नहीं थीं।
जिजाऊ ने अपने पुत्र को यह नहीं सिखाया कि जन्म से कोई श्रेष्ठ या हीन होता है। उन्होंने शिवाजी महाराज को बताया कि राजा वही होता है जो रैयत की रक्षा करे, न कि शास्त्रों की गुलामी करे। यही कारण है कि शिवाजी महाराज का राज्याभिषेक अंततः वैदिक कर्मकांड से नहीं, बल्कि जनस्वीकृति और शक्ति संतुलन से संभव हुआ।
और यह कोई संयोग नहीं कि उसी मनुस्मृति को, जिसने शिवाजी महाराज के राज्याभिषेक का विरोध किया था, डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर ने शिवाजी महाराज की समाधि के समक्ष जलाया। यह प्रतीक था उस वैचारिक युद्ध का, जिसकी नींव जिजाऊ ने रखी थी—एक ऐसा युद्ध जो जाति, ऊँच-नीच और धर्म के नाम पर होने वाले अन्याय के विरुद्ध था।
यदि आज जिजाऊ होतीं…
आज जब मनुस्मृति जैसे ग्रंथों को फिर से “संस्कृति” के नाम पर थोपने के प्रयास हो रहे हैं, जब स्त्री-स्वतंत्रता, सामाजिक समानता और संवैधानिक मूल्यों पर प्रश्नचिह्न लगाए जा रहे हैं—तो यदि आज जिजाऊ मासाहेब जीवित होतीं, तो वे क्या करतीं?
वे चुप नहीं रहतीं।
वे अपने शिवबा से कहतीं—
“शास्त्र वही मान्य हैं, जो मनुष्य को मनुष्य समझें।
जो अन्याय को धर्म कहे, उसका विरोध ही सच्चा धर्म है।”
आज की जिजाऊ अपने शिवबा को संविधान पढ़ातीं। वे उसे बताते कि बाबासाहेब आंबेडकर का संविधान ही आधुनिक स्वराज्य का शास्त्र है। वे शिवाजी महाराज को एक लोकतांत्रिक, समावेशी और न्यायप्रिय नेता के रूप में गढ़तीं—जो सत्ता को सेवा माने, और धर्म को मानवता से ऊपर न रखे।
स्त्री सम्मान : जिजाऊ का सबसे बड़ा राजनीतिक संदेश
जिजाऊ का स्त्री-विषयक दृष्टिकोण आज भी क्रांतिकारी है। शिवाजी महाराज के राज्य में स्त्रियों पर अत्याचार करने वाले को कठोर दंड मिलता था। यह कोई आकस्मिक नीति नहीं थी—यह जिजाऊ के संस्कारों की देन थी।
आज जब स्त्री-सुरक्षा केवल नारों तक सीमित हो गई है, तब जिजाऊ की सीख और भी प्रासंगिक हो जाती है। आज की जिजाऊ अपने बेटे को यह नहीं सिखातीं कि “हमारी बहन-बेटियाँ सुरक्षित रहें”, बल्कि यह सिखातीं कि—
“हर स्त्री तुम्हारी बहन है, और उसका सम्मान तुम्हारा कर्तव्य।”
संविधान, किसान और पर्यावरण : जिजाऊ का आधुनिक स्वराज्य
जिजाऊ का स्वराज्य केवल सत्ता परिवर्तन नहीं था, बल्कि व्यवस्था परिवर्तन था। किसान, रैयत और प्रकृति—ये तीनों स्वराज्य की आत्मा थे। आज जब किसान आत्महत्या कर रहा है और पर्यावरण नष्ट हो रहा है, तब जिजाऊ का विचार हमें चेतावनी देता है।
यदि आज जिजाऊ होतीं, तो वे कॉर्पोरेट-केन्द्रित विकास मॉडल पर प्रश्न उठातीं। वे अपने शिवबा को सिखातीं कि—
“राजा वही है, जो आख़िरी व्यक्ति की पीड़ा समझे।”
जिजाऊ जयंती – एक वैचारिक प्रतिज्ञा
जिजाऊ जयंती केवल पुष्पांजलि का पर्व नहीं है। यह प्रश्न पूछने का दिन है—
क्या हम अन्याय के विरुद्ध खड़े हैं?
क्या हम संविधान को मनुस्मृति से ऊपर मानते हैं?
क्या हम स्त्री, किसान और वंचित के साथ खड़े हैं?
आज की प्रत्येक माता यदि अपने बच्चे में विवेक, विद्रोह और करुणा का शिवबा गढ़े—तो यही जिजाऊ को सच्ची श्रद्धांजलि होगी।
जिजाऊ इतिहास नहीं हैं।
वे भविष्य की कसौटी हैं।
आइए, इस जयंती पर अपने भीतर के विवेक रूपी शिवबा को जगाएँ और उस स्वराज्य का संकल्प लें—जो न्याय, समानता और मानवता पर आधारित हो
संयुक्ता देशमुख नई दिल्ली