नारी ही शक्ति है, नारी ही सृजन है, नारी ही परिवर्तन है।
नई दिल्ली: भारत में नवरात्र आते ही घर-घर में देवी के जयकारे गूंजने लगते हैं, डांडिया-गरबा और गीतों से वातावरण उत्साहपूर्ण हो जाता है। लेकिन क्या यह पर्व केवल व्रत-उपवास का है? या यह पर्व हमें नारी शक्ति की असली पहचान दिलाने के लिए आया है? नवरात्र का अर्थ है – नारी शक्ति के नौ रूपों का स्मरण। दुर्गा का हर रूप हमें बताता है कि स्त्री केवल घर की धुरी नहीं, बल्कि समाज और राष्ट्र की आधारशिला है। भारतभूमि का इतिहास भी इसका साक्षी है कि हर युग में इस धरती ने जीवित देवियाँ दी हैं – रणरागिनियाँ, नवदुर्गाएँ।
पौराणिक काल की स्त्रियों ने त्याग, मर्यादा और संघर्ष के आदर्श स्थापित किए। सीता त्याग और मर्यादा की देवी बनीं। द्रौपदी ने अपमान सहकर भी धर्मसभा में अन्याय के विरुद्ध आवाज उठाई। गर्गी और मैत्रेयी ने सिद्ध किया कि ज्ञान किसी लिंग का मोहताज नहीं होता। सावित्री ने यमराज से अपने पति को वापस लाकर संकल्पशक्ति का सामर्थ्य दिखाया। यह सभी देवियाँ बताती हैं कि स्त्री केवल सहनशील नहीं, बल्कि संघर्षशील भी है।
मानव सभ्यता की नींव रखने में भी स्त्री सबसे आगे रही। निरुति ने कृषि का आविष्कार कर मानव को अन्न और स्थिरता दी। जिजाऊ साहिबा ने शिवाजी महाराज को संस्कार देकर स्वराज्य का बीज बोया। सावित्रीबाई फुले ज्ञानज्योति बनीं और स्त्रियों व वंचित समाज को शिक्षा का प्रकाश दिया। अहिल्याबाई होल्कर ने न्यायप्रिय और लोककल्याणकारी राज्य स्थापित किया, वहीं रानी तारारानी ने मराठा साम्राज्य की ढाल बनकर मुगलों के आक्रमण विफल किए। रानी दुर्गावती ने अकबर की सेना से युद्ध करते हुए बलिदान दिया, झलकारी बाई ने झांसी की रानी का जीवन बचाने के लिए अद्वितीय निष्ठा दिखाई और माता रमाई ने डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर के संघर्ष में अमूल्य योगदान दिया।
शिक्षा और समाज सुधार में फातिमा शेख जैसी पहली मुस्लिम शिक्षिका ने मशाल जलाई। डॉ. रुखमाबाई भारत की पहली महिला डॉक्टरों में शामिल हुईं। ताराबाई शिंदे की रचना “स्त्री-पुरुष तुलना” ने स्त्री समानता का पहला घोषणापत्र प्रस्तुत किया।
आधुनिक भारत की नवदुर्गाओं में इंदिरा गांधी लौह महिला बनकर देश की पहली महिला प्रधानमंत्री बनीं। प्रतिभा पाटिल पहली महिला राष्ट्रपति बनीं। कल्पना चावला ने अंतरिक्ष में भारत का नाम रोशन किया और हर लड़की को यह संदेश दिया कि “आसमान भी सीमा नहीं है।”
संत परंपरा में भी स्त्रियों ने महत्वपूर्ण स्थान पाया। मीराबाई कृष्णभक्ति की मूर्ति बनीं। अक्का महादेवी वैराग्य और तपस्या की प्रतिमा बनीं। ललद्यद कश्मीर की संत कवयित्री बनीं और बहिनाबाई चौधरी ने अभंगों के माध्यम से समाज और धर्म का संगम कराया।
आज की स्त्री का संघर्ष भले तलवार का न हो, लेकिन वह किसी रणभूमि से कम नहीं है। उसे शिक्षा के लिए लड़ना पड़ता है, सम्मान के लिए आवाज उठानी पड़ती है, रोजगार और समान अवसरों के लिए संघर्ष करना पड़ता है और कभी-कभी घर की रूढ़ियों से भी भिड़ना पड़ता है। लेकिन इतिहास बताता है – जब स्त्री ठान लेती है तो कोई शक्ति उसे रोक नहीं सकती। नवरात्र का यही संदेश है कि देवी की पूजा केवल मूर्ति में मत करो, बल्कि हर माँ, बहन और बेटी में उस शक्ति को पहचानो।
नवरात्र हमें सिखाता है कि शक्ति का सम्मान करो, अंधविश्वास में मत फँसो। नारी को देवी मानो, लेकिन केवल पूजाघर में नहीं, जीवन के हर क्षेत्र में। हर बेटी को शिक्षा दो, अन्याय और भेदभाव के विरुद्ध आवाज उठाओ और स्त्री के सपनों की कोई सीमा मत तय करो।
“आज की रणरागिनियाँ, नवदुर्गा” का संदेश यही है कि नवरात्र केवल व्रत-उपवास का पर्व नहीं है, बल्कि स्त्रीशक्ति का महोत्सव है। इतिहास की स्त्रियाँ अपने संघर्ष से अमर हुईं, आज की नारी भी अपने साहस और कर्म से भविष्य का इतिहास लिख सकती है। इसलिए इस नवरात्र हमें केवल मूर्ति की पूजा नहीं करनी चाहिए, बल्कि हर जीवित दुर्गा का सम्मान करना चाहिए। क्योंकि – नारी ही शक्ति है, नारी ही सृजन है और नारी ही परिवर्तन है।
✍️ संयुक्ता देशमुख
इंटरनॅशनल मीडिया की जिजाऊ ब्रिगेड
उत्तर प्रदेश कार्याध्यक्ष, जिजाऊ ब्रिगेड
संस्थापक अध्यक्ष, सुदर्शना फाउंडेशन