स्टेडियम के अंदर जश्न, बाहर भीड़ में दबकर मर गए लोग।
किसी इंसान की मौत की कीमत कितनी है? उसकी मौत पर जश्न मनाया जा सके, इतनी? क्या इस भगदड़ की जानकारी जश्न में डूबे लोगों को नहीं मिली?
कभी किसी नेता के पीछे पागल होती है यह भीड़, कभी कोई नेता इसे पागल बना देता है। लेकिन भीड़ में बस अपनी चाहत में पागल हो चुका, दीवाना हो चुका यह इंसान मर जाता है।
अब आईपीएल जीतने पर कोहली की टीम जब जश्न मनाने के लिए विक्ट्री परेड निकाल रही थी, तब दस लोग भीड़ में दब कर मर गए। सैकड़ों ही घायल हुए होंगें। पूरी खबर आना बाकी है।
कितनी तकलीफ की बात है, किसी का बाप चला गया, किसी का बेटा चला गया। किसी के घर का जिम्मेदार चला गया। लेकिन जिम्मेदार कौन है? प्रशासन? क्रिकेट, जुनून या फिर यह लोग खुद?
हर बार भीड़ में घुट कर, दब कर मर जाने वाले लोगों की मौत हंसी यह सवाल करती है। पूछती है, झंकझोर देती है, तकलीफ देती है, लेकिन हम जवाब दे पाते हैं? बतौर इंसान ही सही कुछ ज़िमेदारी तो हमारी भी है।
आखिर क्यों? और कब तक ? यह सवाल पूछा जाना चाहिए, यह सवाल इंसानों के लिए है होना चाहिए।