विधानसभा, लोकसभा, विधान परिषद और राज्यसभा चारों सदनों का सबसे कम उम्र में सदस्य रहने का रिकॉर्ड बनाने वाले मुनव्वर हसन ठेठ ज़मीनी नेता थे ऐसे नेता, जिन्हें अपनी जड़ों से बहुत प्यार था.
उनके बारे में ये कहा जाता रहा है कि अपने लोकसभा क्षेत्र में जब लोगों से मिला जुला करते थे, तो उन्हें चेहरों से और नामों से याद रखा करते थे क्योंकि वो जनता से दूर नहीं रहा करते थे.
मुनव्वर हसन ने देश की सियासत में एक ऐसा स्थान हासिल किया, जिसे उनके दुनिया से जाने के 17 साल बाद तक भी याद किया जाता है.
उनकी बेटी इक़रा हसन कैराना लोकसभा सीट से सांसद हैं.
उनके बेटे कैराना विधानसभा सीट से विधायक हैं.

मुनव्वर हसन तब सबसे ज़्यादा चर्चा में आये जब उन्होंने यूपी में गुर्जर राजनीति के सबसे बड़े चेहरे और अपने खानदान के चो. हुकुम सिंह को 1991 में चुनाव हरा दिया.
इससे वो राजनीति के युवा तुर्क बन गए, 27 साल के इस नौजवान ने इतिहास रच दिया था और कभी न पीछे मुड़ कर देखने की अपनी राजनीतिक पारी शुरू कर दी थी.
2003 से 2007 के बीच मुलायम सिंह यादव की राज्य सरकार में इन्हें “मिनी मुख्यमंत्री” के नाम से पुकारा जाता था, क्योंकि चौधरी मुनव्वर का जलवा कैराना से लेकर लखनऊ तक चला करता था.
मुलायम सिंह यादव ने हमेशा उन्हें अपने खास लोगों में गिना, हालांकि मनमुटाव वाला दौर भी रहा मुन्नवर हसन को पार्टी छोड़नी पड़ी.
2008 के एक सड़क हादसे में वो चल बसे…
जब अपना प्रोटोकॉल तोड़ कर तत्कालीन मुख्यमंत्री मायावती उनकी मिट्टी में शामिल होने कैराना पहुंची थी और राजनीतिक तौर पर धुर विरोधी हुकुम सिंह फुट फुट कर रो रहे थे। क्या कैराना,मुजफ्फरनगर और पश्चिमी यूपी से लेकर लखनऊ तक हर तरफ इस दिग्गज नेता के चले जाने का दुख था.
अब मुनव्वर हसन क्यों नहीं होते? जो जनता के बल पर चुनाव लड़ते थे, किसी भी प्रतिद्वंद्वी से कभी नहीं डरते थे, जो न पार्टी बदलने से डरते थे बल्कि मर्ज़ी से पार्टी बदल लेते थे, सीट बदल लेते थे लेकिन जनता उन्हें जिता देती थी.
जनता से मिलते थे और हार भी गए तो जनता के बीच रहते थे ओर जनता के बेटे, भाई और चाचा बन जाते थे, उनका दरवाज़ा हमेशा आवाम के लिए खुला रहता था .