बकरीद एक ऐसा त्यौहार है जिसमें हर शहर और कस्बे में आर्थिक ऐक्टिविटी बिल्कुल टॉप पर पहुंच जाती है देहात में गैर मुस्लिम समाज के लोग जो बकरी पालन करते हैं, इस त्यौहार का इंतजार करते हैं और बकरों की बिक्री से एक एक आदमी इतनी अर्निंग करता है कि साल या आधे साल का खर्च इसी से निकल आता है पूरे मुल्क के पैमाने पर देखा जाए तो सैकड़ों करोड़ रुपए एक सूबे में अकेले इकॉनमी में पंप होते हैं और देश की आर्थिक व्यवस्था मजबूत होती है .
आपको पसंद नहीं, कोई बजट नहीं मगर अपना bias और अपने लिमिटेड एक्सपीरिएंसको समाज पर मत लाड़िए बकरीद के अगले कई दिन मुस्लिम, सभी धर्मों के लोगों को फ्री मटन भी देते हैं, 70-75 परसेंट नॉनवेज खाने वालों के देश में हर आदमी इतना अफोर्ड नहीं कर पाता मगर बकरीद की वजह से लोगों को प्रोटीन मिल जाता है और काफी दिन लोग खाते हैं खास बात ये है कि अक्सर खबरों और मीडिया के स्टाफ में जो लोग हैं वह इससे अंजान बने रहते हैं.
इनको अपनी कॉलोनी और शहर के चंद मोहल्लों के बाहर बसे बत्तीस लाख स्वायर किलोमीटर में फैले हिन्दुस्तान और इसकी सामाजिक संरचना की कितनी समझ है, इसका अंदाजा आप लगा सकते है इनको सैकड़ों साल से डेवलप हुए भारतीय समाज में ग्राउंड पर हिंदू और मुस्लिम की इकॉनमिक और सोशल, कल्चरल और सामाजिक रिश्तों से क्या लेना देना?
जब जहन रेस्ट्रिक्टेड कर लिया जाए और एक छोटे दायरे के पार देखना ही नहीं है, तो इसकी जरूरत भी नहीं होती, बहरहाल अपने शहर की ही गलियों और मोहल्लों, रियल इशूज से नावाकिफ लोगों को इस विशाल देश और इसके मल्टीपल एस्पेक्ट्स से कितना लेना देना है ये तो आप इन अखबारों का हाल देख कर ही समझ सकते हैं –
-Shams Ur Rehman Alavi