आज मीर वारिस अली की यौम ए शहादत है, 6 जुलाई 1857 को पटना मे उन्हे फांसी पर लटका कर शहीद कर दिया गया था; मीर वारिस अली पुलिस की नौकरी करते थे; जमादार की हैसियत रखते थे; अंग्रेज़ों से बग़ावत की और फांसी पर झूल गए!
असल में ये एक बड़ी योजना का भंडाफोड़ था। जिसके बारे में वीर सावरकर ने 1909 में अपनी किताब में लिखा, “तिरहुत ज़िले के पुलिस जमादार वारिस अली का आचरण अंग्रेज़ अधिकारियों को संदिग्ध प्रतीत हो रहा था और अधिकारियों ने अचानक उसके घर को घेर लिया और उसे गिरफ़्तार कर लिया। यह जमादार, जो अंग्रेज़ों की सेवा में था, उस समय गया के इंक़लाबी नेता अली करीम को ख़त लिख रहा था!
उसके घर से बरामद इंक़लाबी ख़तूत को सबूतों मानते हुए उसे जल्द ही मौत की सज़ा सुना दी गई। जब उसे फांसी पर ले जाया गया, तो वह चिल्लाया, “यदि यहाँ कोई सच्चा स्वराज्य भक्त है, तो मुझे मुक्त करे!” लेकिन, जब तक उसकी पुकार सुनी जाती, उसका निर्जीव शरीर फांसी पर लटक चुका था!”
जून 1857 में जिस वक़्त वारिस अली को अंग्रेज़ शासकों के ख़िलाफ़ साजिश करने के आरोप में गिरफ़्तार किया गया। उस वक़्त उनके पास से अली करीम के कई ख़त भी बरामद हुए थे। और इस तरह बिहार में अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ एक बड़े षड्यंत्र का पर्दाफ़ाश हुआ।
उसी में एक ख़त, 12 जून 1857 को, जिस दिन देवघर में अमानत अली की क़यादत में भारतीयों ने विद्रोह किया, अली करीम ने वारिस अली को एक ख़त में लिखते हैं — “अब हालात बदलते नज़र आ रहे हैं। तुम्हारा फ़ौरन आना बेहद ज़रूरी है। आज मैंने अपना प्यादा, मंसूर अली, तुम्हारे पास एक ख़त लेकर भेजा है; एक और ख़त बहुत ही सावधानी से डाक से भेजा है। इसे देखते ही किसी भी तरह, छुट्टी लेकर या किसी भी उपाय से, तुरंत चले आओ। बिल्कुल देर मत करना। सब कुछ तुम पर निर्भर है। तुम्हारे आए बिना हम जैसे ग़रीबों की इज्ज़त, जायदाद और जान की हिफ़ाज़त नामुमकिन है। ऐसे वक़्त में तुम्हारा यहां होना ज़रूरी है; वरना मुझ जैसे बूढ़े और कमज़ोर आदमी से कुछ नहीं होगा। घोड़ा आदि साथ लेकर आना। मैं हर पल तुम्हारे आने का इंतज़ार कर रहा हूँ।”
इन ख़ातूत के हाथ लगने के बाद पटना के कमिश्नर टेलर ने 2 जुलाई 1857 को अली करीम की गिरफ़्तारी का आदेश दिया। लेकिन उन्हें पकड़ा नहीं जा सका।
कमिश्नर ने रिपोर्ट किया, “जब मुझे मुज़फ़्फ़रपुर के मजिस्ट्रेट से वारिस अली की गिरफ़्तारी और उसके पास से अली करीम के ख़त मिलने की ख़बर मिली, तो मैंने तुरंत मजिस्ट्रेट लोविस और दीवान मौला बख़्श को बुलवाया। मैंने मजिस्ट्रेट से कहा और उससे तुरंत कैप्टन रैट्रे के साथ डूमरी, जहाँ अली करीम रहता था, जाकर उसे पकड़ने का हुक्म दिया।
“कुछ घंटों के बाद, लोविस और कैप्टन रैट्रे दस सवारों के साथ बग्घी में निकले। अली करीम के घर पहुँचने पर पता चला कि वह अपने कुछ लोगों के साथ हाथी पर सवार होकर उनके पहुँचने से ठीक पहले निकल चुका था।”
वीर सावरकर ने इसका वर्णन कुछ अलग तरह से किया। उन्होंने लिखा, “जब अंग्रेज़ी दल के मुखिया लोविस, अली करीम के घर पहुँचे, तो अली करीम हाथी पर सवार हो गए और उनमे और अंग्रेज़ों में एक रोमांचक दौड़ शुरू हो गई! आसपास के गाँव वालों ने, जो अली करीम के वफ़ादार थे, ने उन्हें फ़िरंगियों से भागते देख, अंग्रेज़ों को परेशान करना शुरू कर दिया, यहाँ तक कि उन्हें रास्ता भटका दिया और आख़िरकार उनकी टट्टू भी चुरा ली!
अंग्रेज़ अफ़सर ‘थकान और निराशा से झुंझलाकर’ अपने भारतीय नौकर पर अली करीम का पीछा करने का ज़िम्मा छोड़ ख़ुद वापस पटना लौट आए और अगले दिन नौकर भी, जो अंग्रेज़ों से नफ़रत ही करता था, ने अली करीम का पीछा छोड़ दिया और शर्मिंदा चेहरा लेकर अपने मालिक के पास वापस ख़ाली हाथ लौट गया।”

इसी सब वाक़िये ने पटना में आग भड़का दी, 3 जुलाई 1857 को पीर अली की क़यादत में बग़ावत हो गई, एक अंग्रेज़ डॉ लायल मारा गया। जिसके बाद अंग्रेज़ों ने वापस से पटना में क्रैकडाउन शुरू किया। सैंकड़ों लोग गिरफ़्तार हुए। और फिर शुरू हुआ बिना ट्रायल के फाँसी का सिलसिला। 6 जुलाई 1857 को पटना मे मीर वारिस अली फांसी पर लटका लटका दिए गए, जिसकी ख़बर 21 जुलाई 1857 को बांकीपुर से छपने वाले अख़बार ए बिहार में कुछ यूँ दर्ज है – हज़रत फाँसी के वक़्त कल्मा ए शहादत पढ़ते रहे और आख़िर में ये बोले कि अगर कोई अज़ीज़ बादशाह ए दिल्ली हो तो उनकी मदद करे। मैं क़ुराबात शाह ए दिल्ली हूँ। मालूम नहीं इसका क्या मानी थी ? कुजा कलमा लाइलाहा – कुजा ख़याल ए बादशाह –
इसके ठीक अगले दिन 7 जुलाई 1857 को पटना के गांधी मैदान के पास अंग्रेज़ों से बग़ावत के जुर्म में पीर अली सहित उनके दर्जनों साथी सूली पर लटका लटका दिए जाते हैं। इस वाक़िये ने दानापुर फ़ौजी बैरक में बेचैनी पैदा कर दी और 26 जुलाई को वहाँ सिपाहियों की बग़ावत हो जाती है और अगले दिन ये सिपाही कुँवर सिंह के साथ मिलकर क़रीब एक साल तक अलग अलग मोर्चों पर जंग में शामिल होते हैं और इन्ही कई मोर्चों पर अली करीम को भी देखा जाता है।
वैसे ये हमारे लिए शर्म की बात है के शहादत के 160 साल बाद मीर वारिस अली को स्वतंत्रता सेनानी का दर्जा दिये जाने की पहल हुई है, और 2018 में उन्हे मुज़फ़्फ़रपुर ज़िला प्रशासन द्वारा स्वतंत्रता सेनानी माना गया। जबके 1909 में वीर सावरकर ने अपनी किताब में मीर वारिस अली का ज़िक्र किया था; के किस तरह वो ‘कल्मा ए शहादत’ पढ़ते हुए अपने मुल्क हिन्दुस्तान की ख़ातिर शहीद हुए!
पटना मे तो वारिस अली के नाम पर कुछ नही है, पर मुज़फ़्फ़रपुर में कभी एक सड़क ‘वारिस अली रोड’ हुआ करती थी; जो धीरे धीरे ‘वरसल्ली रोड’ में तब्दील हो गया और आज कल स्टेशन रोड के नाम से जाना जाता है! इस तरह बिहार ने अपने पहले शहीद मीर वारिस अली को भुला दिया।
पर कल तारीख़ है 7 जुलाई; और कल बिहार सरकार राजकीय सम्मान के साथ पटना में शहीद पीर अली ख़ान और उनके साथीयों की यौम ए शहादत के मौक़े पर एक छोटा सा प्रोग्राम करेगी; जिसमें उन 14 शहीदों को श्रद्धांजली दी जाएगी; जिन्हे अंग्रेज़ों से बग़ावत के जुर्म में 7 जुलाई 1857 को पटना के गांधी मैदान के पास सूली पर लटका दिया गया था।
मो . उमर अशरफ