“एक वक्त था जब दिल्ली की फिज़ाओं में तलवारों की खनक थी, हर गली में डर और तबाही का साया मंडरा रहा था… लेकिन उसी दिल्ली की एक गली से उठी ऐसी आवाज़, जिसने पूरी राजधानी को सुकून और मोहब्बत की राह दिखा दी।”
दिल्ली के इतिहास में एक नाम ऐसा है जो सिर्फ एक धार्मिक शख्सियत नहीं, बल्कि मोहब्बत और इंसानियत की जीती-जागती मिसाल बना — हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया।
13वीं सदी में दिल्ली सल्तनत के दौर में, जब मंगोलों के हमलों से पूरा हिंदुस्तान काँप रहा था, तब बदायूं से एक 20 साल का नौजवान दिल्ली आया। नाम था — निज़ामुद्दीन। उनके पास ना कोई तलवार थी, ना कोई सेना… उनके पास था सिर्फ एक संदेश — “प्यार, शांति और इंसानियत”।
उन्होंने दरगाह बनाई — एक ऐसी जगह, जहां ना मजहब देखा गया, ना जात।
यहां अमीर खुसरो से लेकर आम आदमी तक, सबने मोहब्बत का पैग़ाम पाया। उनके दरबार में हिंदू भी थे, मुसलमान भी, अमीर भी थे और गरीब भी।
🎙️ “हम किसी मज़हब के नहीं, सिर्फ इंसानियत के पुजारी हैं”, ये उनके शब्द थे।
हज़रत निज़ामुद्दीन और अमीर खुसरो की दोस्ती इतिहास में बेमिसाल मानी जाती है।
अमीर खुसरो ने एक बार कहा था —
“अगर क़यामत के दिन मुझसे पूछा जाएगा कि तुमने क्या किया, तो मैं निज़ामुद्दीन औलिया को आगे कर दूंगा।”
और शायद यही वजह है कि आज भी खुसरो की कब्र निज़ामुद्दीन की दरगाह के आंगन में है — गुरु और शिष्य, दोनों एक ही जगह पर सुकून में सो रहे हैं।
📌 इतिहास गवाह है, जब सुल्तान गयासुद्दीन तुगलक ने उन्हें दिल्ली छोड़ने का हुक्म दिया, तो उन्होंने कहा था —
“हूंज़ दिल्ली दूर अस्त!” (दिल्ली अभी दूर है)।
और नियति ने वही किया — गयासुद्दीन तुगलक दिल्ली लौटने से पहले ही दुनिया छोड़ गया।

हज़रत निज़ामुद्दीन ने सत्ता और धन को ठुकराया।
एक बार 5 लाख टंका गरीबों में बांटने के लिए आए, तो उन्होंने लौटा दिए। कहा —
“अगर खुदा दिल में है, तो कोई दौलत, कोई ताक़त इंसान को नहीं बदल सकती।”
आज भी, हर वसंत पंचमी को उनकी दरगाह पीले फूलों और संगीत से भर जाती है।
कहते हैं, ये वही महफिल है जहां अमीर खुसरो ने अपना पहला वसंत गीत गाया था।
📍 आज जब नफरत और हिंसा की आंधी बार-बार समाज को बाँटने की कोशिश करती है, निज़ामुद्दीन औलिया की दरगाह हमें याद दिलाती है —
“मज़हब इंसानियत से बड़ा नहीं हो सकता। और अगर खुदा कहीं है, तो वो सिर्फ एक साफ़ दिल में बसता है।”
लेखक – असद शैख़